Wednesday, August 3, 2016

माँग

माँगना था उसे कुछ उस दिन.....
झिझक रही थी बड़ी वो कमसिन
पता नहीं क्यों झीझक रही थी
ऐसी कौनसी चीज़ जो उसकी नहीं थी!!

कहाँ उससे मांगो बस अब
जहाँ से लेकर जाँ तक सब!!!!
आँखें में प्यार और मन कर सख्त
मुझसे खुद को ही मांग बैठी कमबख्त!!!

रातों की मेरे, चांदनी मांगली
सवेरों से मेरी, आशाएं मांगली
बाग़बान जिंदगी से, अपनी बहार मांगीली
झरोखों में सजी, सृष्टि मांगली....

होने का मेरी, वजह मांगली
मन खोकला कर, मुरादे मांगली
बिखरे बिस्तर खाली, अपनी खुशबु मांगली
घरौंदा पत्थर कर, सारी मोहब्बत मांगली!!!

लूट कर, खड़ा रहा बाजार में..
ओझल हो गयी पर वो भीड़ में
स्तंभित खड़ा रहा इंकार में
झूठी आशा बस बची थे मुझे में!!!

खड़े होकर फिर क्यों गिरता हूँ....
मरहम अपना उसी में  क्यों ढूंढता हूँ
सासों में अपनी खुद क्यों जिन्दा करता हूँ
बिख़िरी रूह मेरी, आज भी क्यों सवरता हूँ
बिख़िरी रूह मेरी, आज भी क्यों सवरता हूँ

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