खड़ा हूँ मैं यहाँ अकेले
इन खेतों के चौराहे पर!!
फैला कर अपनी शाखाये
और गहरी जड़ों को गड़ाए!!!
बेदाग़ नीले अंबर के निचे
सुखी, झुलसती दरारों पे!!
देखा है उसे परिश्रम करते
अरमानो को ज़मीन में बोते!!!
आँखों में हज़ारों बारिशें लिए
हरे लहराते सपने सजाये
रोज़ आता अपने तलवे जलाते.....
आसमान पर फिर हम अपनी नजरे गड़ाते!!
मेहफ़ूज़ ठंडे साये मैं मेरे
मायूसियत के दिन बेहने लगे!!!
सावन तो अब बस, आँखों से बरसते.…
गीले तो सिर्फ मन ही हो पाते!!!
नदी, कुए सब सहरा बन गए.…
खोखली बहने लगी है हवाएं
दुवाओं के हौज भी लगे अब सुखने
बोई बीजों की बन गयी है कब्रे
कर्जे पर लायी थी आशाएँ, उधार लिए थे सपने!
खून-पसीने से भविष्य बोये थे अपने
खेत सारे बन गए अब शमशान
जीवन से मौत लगने लगी है आसान
निस्तब्ध खड़ा रहा, मैं, चुपचाप
मजबूत शाखा बन गयी मेरा अभिशाप
तने के साथ-साथ रूह भी कापी थी
जब लटका कर खुदको, उसने अपनी, जान लेली थी
वजह उसके मरने की क्यों बना मैं
कितना-कैसे रोकना, उसे चाहता था मैं
मेरी बाँहों में जान निकलती, देखता रहा मैं
जड़ों से माँ के गले लग, रोता रहा मैं
पार्थिव रखा, उसका मेरी ही छाव मैं
बेजुबान बेवा खड़ी थी बगल में
"जायज़" खुदखुशी फिर साबित कर परिवार ने
लक्ष रुपयो में तोली मौत सरकार ने!!!!
खड़ा हूँ मैं अभी यहाँ, कई और मौतों की वजह बनके
शमशान बने इन खेतों में, अपनी मौत के इंतज़ार में!!!!!
-- आशिष कारखानिस
इन खेतों के चौराहे पर!!
फैला कर अपनी शाखाये
और गहरी जड़ों को गड़ाए!!!
बेदाग़ नीले अंबर के निचे
सुखी, झुलसती दरारों पे!!
देखा है उसे परिश्रम करते
अरमानो को ज़मीन में बोते!!!
आँखों में हज़ारों बारिशें लिए
हरे लहराते सपने सजाये
रोज़ आता अपने तलवे जलाते.....
आसमान पर फिर हम अपनी नजरे गड़ाते!!
मेहफ़ूज़ ठंडे साये मैं मेरे
मायूसियत के दिन बेहने लगे!!!
सावन तो अब बस, आँखों से बरसते.…
गीले तो सिर्फ मन ही हो पाते!!!
नदी, कुए सब सहरा बन गए.…
खोखली बहने लगी है हवाएं
दुवाओं के हौज भी लगे अब सुखने
बोई बीजों की बन गयी है कब्रे
कर्जे पर लायी थी आशाएँ, उधार लिए थे सपने!
खून-पसीने से भविष्य बोये थे अपने
खेत सारे बन गए अब शमशान
जीवन से मौत लगने लगी है आसान
निस्तब्ध खड़ा रहा, मैं, चुपचाप
मजबूत शाखा बन गयी मेरा अभिशाप
तने के साथ-साथ रूह भी कापी थी
जब लटका कर खुदको, उसने अपनी, जान लेली थी
वजह उसके मरने की क्यों बना मैं
कितना-कैसे रोकना, उसे चाहता था मैं
मेरी बाँहों में जान निकलती, देखता रहा मैं
जड़ों से माँ के गले लग, रोता रहा मैं
पार्थिव रखा, उसका मेरी ही छाव मैं
बेजुबान बेवा खड़ी थी बगल में
"जायज़" खुदखुशी फिर साबित कर परिवार ने
लक्ष रुपयो में तोली मौत सरकार ने!!!!
खड़ा हूँ मैं अभी यहाँ, कई और मौतों की वजह बनके
शमशान बने इन खेतों में, अपनी मौत के इंतज़ार में!!!!!
-- आशिष कारखानिस