Monday, August 24, 2015

पेड़

खड़ा हूँ मैं यहाँ अकेले
इन खेतों के चौराहे पर!!
फैला कर अपनी शाखाये
और गहरी जड़ों को गड़ाए!!!

बेदाग़ नीले अंबर के निचे
सुखी, झुलसती दरारों पे!!
देखा है उसे परिश्रम करते
अरमानो को ज़मीन में बोते!!!

आँखों में हज़ारों बारिशें लिए
हरे लहराते सपने सजाये
रोज़ आता अपने तलवे जलाते.....
आसमान पर फिर हम अपनी नजरे गड़ाते!!

मेहफ़ूज़ ठंडे साये मैं मेरे
मायूसियत के दिन बेहने लगे!!!
सावन तो अब बस, आँखों से बरसते.…
गीले तो सिर्फ मन ही हो पाते!!!

नदी, कुए सब सहरा बन गए.…
खोखली बहने लगी है हवाएं
दुवाओं के हौज भी लगे अब सुखने
बोई बीजों की बन गयी है कब्रे

कर्जे पर लायी थी आशाएँ, उधार लिए थे सपने!
खून-पसीने से भविष्य बोये थे अपने
खेत सारे बन गए अब शमशान
जीवन से मौत लगने लगी है  आसान

निस्तब्ध खड़ा रहा, मैं, चुपचाप
मजबूत शाखा बन गयी मेरा अभिशाप
तने के साथ-साथ रूह भी कापी थी
जब लटका कर खुदको, उसने अपनी, जान लेली थी

वजह उसके मरने की क्यों बना मैं
कितना-कैसे रोकना, उसे चाहता था मैं
मेरी बाँहों में जान निकलती, देखता रहा मैं
जड़ों से माँ के गले लग, रोता रहा मैं

पार्थिव रखा, उसका मेरी ही छाव मैं 
बेजुबान बेवा खड़ी थी बगल में
"जायज़" खुदखुशी फिर साबित कर परिवार ने
लक्ष रुपयो में तोली मौत सरकार ने!!!!

खड़ा हूँ मैं अभी यहाँ, कई और मौतों की वजह बनके
शमशान बने इन खेतों में, अपनी मौत के इंतज़ार में!!!!!

-- आशिष कारखानिस

Friday, August 14, 2015

राह

सोचती हूँ, मैं एक राह.……
में किस्से प्यार करू!!!
किससे अपना सफर बाटू .……
किसकी मंज़िल में बनु!!!


उस मोड़ से जो.……
खुद ठहर, मुझे बदलता....
नयी दिशा ,नया क्षितिज दिखता.…
पुराने जनाजों को धुन्दला कर
उम्मीद के नए मायने समझाता!!!

मगर मेरे आगे बढ़ने पर भी .…
 ....... वही रह जाता!!!!!


या उस चौराहे से जो.……
नये विकल्प, नयी मंज़िले दिखता.…
मुझ जैसी एक और से मिलता..... !!
दो पल के लिए एक सखी दिलाता.
सुख-दुख बाटने का अवसर दिलाता!!

मगर जो मेरे साथ-साथ
........ उसे भी उतना ही चाहता!!!!!


उस मक़ाम से प्यार करू.……
मेरे सफर की कहानी सुनाता
मेरे अग्रिम होने को दर्शाता!!!!
जो मेरे भुत में देख.…
भविष्य की बात करता!!!

मगर में आगे बढ़ते ही
……खुद बदल जाता!!!!


या उस मंज़िल से जो .……
मेरा जिना मुक्कमल है 
मेरे अस्तित्व का एहसास है!!
मेरे सफर की जो इन्तहा है.…
और मेरे जीवन का अंतिम सच!!!

मगर उससे मिलन से ही
.…मेरा अंत हो जाता!!!


या उस राही से.…
जो मेरे निरंतर साथ चलता.……
मुझे पे अपने निशाँ छोड़ता जाता
मुझे सजाता-सवरताा सुन्दर बनाता.……

मगर जो मंज़िल के पाने पर
....... मुझे ही भूल जाता!!!!!!


राही, मोड़, मकाम, नज़ारे.……
है ये सभी फिर भी मेरे अपने!!
हमराह है मेरे बस.……
हमसफ़र कोई नहीं!!!
हमसफ़र कोई नहीं!!!