एक कम्बल की ही तो बात थी…………बस!!!!!
नहीं मांगी थी दुनिया भर की दौलत
ऊँचे दरो-दीवारों की नही थी चाहत
कभी नहीं चाही कोई शानो-शौकत
मेहेंगी चीज़ें तो नहीं……बस!!!!
बस……एक कम्बल की ही तो बात थी!!!!!!
पेट की आग ज्वालामुखी बन गयी
उसी की लौ तो दिल जला गयी!!!
बाहर सर्दी कहर मचा रही थी
जिस्म को चीरती आग बुझाने चली थी
आग अपनी और सर्दी परायी थी ……बस!!!!
बस……एक कम्बल की ही तो बात थी!!!!!!
सर्दी से मुकद्दर भी सिकुड़ गया.....
भगवान का दिल, पत्थर सा जम गया!!
घने कोहरे के पीछे सूरज भी छीप गया.…
रोशन कर दुनिया, खाली हाथ ही आ गया!!
नर्म धुप तो नहीं……बस!!!!
बस……एक कम्बल की ही तो बात थी!!!!!!
बुखार से कापते बच्चे को सीने से लगायी रही
तपते लिहाफ से तो.… माँ को ही आंच मिलती रही!!
सुबह जब ठंडे बदन का एहसास हुआ.....
ममता का तो तभी देहांत हुआ!!
दुआ-दवा तो नहीं……बस!!!!
बस……एक कम्बल की ही तो बात थी!!!!!!
नहीं देखे थे उसके लिए हसीं सपने……
नहीं सुनाये कभी उसे परियों, राजा-रानीयों के किस्से!!!
सरस्वती तो बस रूठ ही गयी थी……
जीने की चाह तो जिन्दा रखी थी!!!
नहीं देखे थे उसके लिए हसीं सपने……
नहीं सुनाये कभी उसे परियों, राजा-रानीयों के किस्से!!!
सरस्वती तो बस रूठ ही गयी थी……
जीने की चाह तो जिन्दा रखी थी!!!
खिलौनौ की तो नहीं……बस!!!!
बस……एक कम्बल की ही तो बात थी!!!!!!
भोर के सन्नाटे चीरती, ममता चीखती रही.…
वीरान सड़को की रूह तक कांप गयी!!!
पत्थर के मकानो से टकरा कर चुरचूर होती रही
उनमें बसी रूह तो उससे भी पत्थर की बनी थी!!!!!!
नया नहीं...भीक ही सही..... मगर……बस
बस……एक कम्बल की ही तो बात थी!!!!!!
सर्द हवा माँ को भी पत्थर बना गयी!!
नपुंसकः दुनिया सिर्फ देखती रेह गयी.… .
जिन्दा लाशों से भरी दुनिया बन गयी.....
कफ़न ही पहना दो इन्हे……बस!!!!
बस क्यों की आखिरकार……
……एक कम्बल की ही तो बात थी!!!!!!
एक कम्बल की ही तो बात थी!!!!!!नपुंसकः दुनिया सिर्फ देखती रेह गयी.… .
जिन्दा लाशों से भरी दुनिया बन गयी.....
कफ़न ही पहना दो इन्हे……बस!!!!
बस क्यों की आखिरकार……
……एक कम्बल की ही तो बात थी!!!!!!
1 comment:
Badhiya...
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