इस कहानी के सारे पात्र और घटनाए वास्तवीक है और इनका काल्पनिकता से कोई संबंध नहीं है!!!!!....... अगर पढ़ते समय इसने, उसने, वो, हम, वे इत्यादि सर्वनामों के जगह अगर खुद को पाए तो अपना-अपना नाम लेकर भी इसे पढ़ सकते है!!!
सारे लोग परेशान थे, लोगों में असंतोष बढ़ रहा था। हम सारे किसी मसीहा की प्रतीक्षा कर रहे थे!!... हमें बचाने वाला, हमारे कष्ट दूर करने वाला कब आएगा, इसी इंतज़ार में अपने दिन या में कहूं राते बिता रहे थे!!! ऐसे मे हमारे office के वरिष्ठोने हमे ये खुशखबरी दी की हमे इस मुश्किल मे से निकालने के लिए वो मसीहा आ गया है!!!............... हमारे ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा।
फिर अगले दिन हमने office में उस मसीहा को देखा, सब लोगों में खुसर-फुसर शुरू हो गयी.....
कहीं ये वो तो नहीं.... कहीं ये वो तो नहीं!!!!!!
हमारी HR उसे हमे मिलाने के लिए लायी और एक लम्बे-चौड़े लड़का, दिखने में एकदम हीरो के जैसा, लम्बे बाल, मुस्कुराता हुआ,कम-से-कम ६ फीट लंबा, जिसके बड़े-बड़े पंजो से हाथ मिलाकर ही कसरत करने वाले हाथ है, ये साफ़ समझ आता!!!!...... मैंने हाथ मिलाया और कहा,
"Hi, Ashish",
जवाब आया,
"Hi, Pappu Sharma"....
मेरे चेहरे पर उसने आश्चर्य और हसी दोनों पढ़ ली थी शायद क्यों की उसने बिना रुके हस्ते हुए कहाँ,
"real name ही Pappu है Sir!!".....
में पूरी तरह से शर्मिंदा हुआ था, अपनी अश्चार्यता और हसी को शायद में इतने अच्छी तरह छुपा नहीं पाया!!!!.... मुझे लगा, उसे आदत थी मेरे जैसे लोगों की, अपने नाम से वो नहीं, उसके जवाब से शायद मेरे जैसे लोग शरमाते थे!!!...वो हस्ता हुआ चेहरा मगर याद रह गया!!!
मुझे उस वक़्त लगा की ये सच-मुच पागल है जो उसने ये नौकरी को हां बोला, उस वक़्त हम तो रात की उस project की चौकीदारी से बचने की ख़ुशी मना रहे थे!!.....जी हां!!!!!! चौकीदारी ही थी वो, क्यों की एक फटा हुआ project बराबर चल रहा है या नहीं येही देखना था रात भर और अगर कुछ गड़बड़ लगे तो अपना दिमाग न लगाते हुए वरिष्ठो को phone करने का और उसके बाद client को। US का प्रोजेक्ट होने के वजह से रात भर बैठना पड़ता था जिसके लिए हम परेशां हो चुके थे!!!… ऐसा काम, जिस में सिखने जैसा छोड़ो मगर कोई काम भी नहीं है ऐसा काम क्यों लेगा कोई!!!......बहुत जल्दी अपनी धारणा बना लेना उस वक़्त आदत थी हमारी!..... जो जल्द ही बदलने वाली थी।
थोड़ी ही दिनों में हमारा काम दिन के दायरों को छोड़, रात में बहने लगा और हम दिन-रात office में रहने लगे। जिसका मतलब ये था की हम जिस "मसीहा" को अब भूल चुके थे, उससे अक्सर रूबरू होने लगे। मेरे और मेरे दोस्त की जैसे जैसे उससे बातचीत बढ़ने लगी, वैसे वैसे हमे वो और भी दिलचस्प लगने लगा। बहुत दिनों तक वो हमारे रात का मनोरंजन था या जिसे हम अब शुद्ध "हिंदी" में "Time-Pass" कहते है। उसके साथ मजाक-मजाक में होने वाली बातचीत अब वक़्त के साथ अच्छी पहचान में बदल रही थी। एक ही उपनगर(suburb ) के होने कारन समानताये तो थी ही और बात करने के लिए विषय भी बहुत थे। बात करते करते उसकी हिंदी भाषा की समझ और मुहावरे याद रहने लगे। में नागपुर मे कुछ वर्ष बिताने के कारन, हिंदी काफी सुधर गयी थी मगर मुंबई में वैसी ही हिंदी सुनकर अच्छा लग रहा था।
हम उसे धीरे-धीरे समझने लगे थे। वो कहाँ से आया था, कैसे यहाँ तक पंहुचा था, कितने सालों तक क्या-क्या और कहाँ-कहाँ काम किया था, ये सब बातों-बातों में हमे पता चला। उसका काम का और शायद काफी हद तक जिंदगी का तजुर्बा हमसे बहुत ज्यादा था और सब से महत्वपूर्ण बात ये की हमसे बहुत अलग था!!!....उस तजुर्बे ने उसे काफी जल्दी समझदार बनाया था, लोगों का सम्मान करना सिखाया था, सामने वाला अगर कोई चीज़ करता है या कहता है, तो उसमें उसकी भी कोई सोच या मजबूरी होगी समझने की ही नहीं स्वीकारने की भी ताकत थी उस में। सीधा-सीधा कहु तो वो सामने वाले को "मौका" देता था और खुद को उसे समझने के लिए वक़्त। उससे बातें करके में भी और शायद मेरा दोस्त भी काम के अलावा बहुत कुछ सिख रहे थे!!!......
दूसरी चीज़ जो उसको उस जैसे अनेकों से अलग करती थी और मुझे सब से ज्यादा भा गयी थी क्यों की मुझ में नहीं थी, वो थी "लगन" और जो भी, जैसा भी काम है उसे हस्ते हुए, लुफ्त उठाते हुए पूरा करना। वो रात भर अकेला बैठा रहता, कुछ पढता, खेलता, internet पे रहता मगर सोता नहीं था!!... हम सब कभी न कभी उस चौकीदारी में सोये थे, मगर वो जागता था। वो उस में भी खुश था। हम फिर उसे हमारे काम के बारे में बताने लगे, हमें शायद उस में एक अच्छा विकल्प दिख रहा था। अगर ये काम इतना मजा लेके करता है तो वाकई में अच्छा काम को किस तरह से अंजाम देगा ये हम सोच रहे थे। इसी बात को हमने हमारे वरिष्ठो को बताया, मगर अगर उसे वहां से हटाया तो रात की वो चौकीदारी कौन करेगा?? इस सवाल पर सब कुछ ठहर गया।
मेरे दोस्त ने युही उससे एक दिन।।।माफ़ कीजिये रात को, बातों-बातों में पुछा,
"आगे क्या करना है"......... झट से बोला
"Sir, आप के जैसा Programming आना चाहिए!.",
मेरे दोस्त ने फटकारा,
"क्या येही करते हुए आएगा, या अचानक सुबह उठके तू Progammer बनेगा!!.. " सीधी बात करना हम को कभी आया ही नहीं उससे!!!
"sir, आप बताओ, कुछ काम है तो दो ना, में करूँगा, सुबह रुकता हूँ!!...आपको दिखा कर जाऊंगा!!!".
उसे फिर हम छोटे-छोटे अंकगणित के क्रमादेश (algorithm ) लिखने के लिए देने लगे। हमने भी तो ऐसे ही शुरवात की थी, वो लिखता था, पूछता था, गाली खाता मगर फिर पूछके करता। थोड़े ही दिनों में उसे "logic" क्या होता है उससे क्रमादेश कैसे बनाना, फिर अपने ही क्रमादेश की जाच(testing) कैसे करना ये सब आने लगा।
उसे फिर मेरा दोस्त उसके project में से छोटा-छोटा काम देने लगा। वो बिना जाने वो भी करने लगा और तब हमें लगा की इसे अब कोई संगणकीय-भाषा (programming language) सीखनी चाहिए। उसे Java नहीं करना था इस लिए मेरे दोस्त ने उससे पढने के लिए Dotnet के ebooks, और online sites इत्यादि की जानकारी दी। उसके बाद तो उसकी Technical Ragging होती थी ये कहना ही उचित होगा!!!
धीरे-धीरे उसे समझने लगा, हमने जो हमारे Masters में सिखा था उसे सिखाने लगे। हमें भी नहीं आता था, मगर जितना आता था उसे बताते थे, थोड़ी ही दिनों में मुझे लगने लगा की गाली दे-दे के सिखाया हुआ, सिखने के लिए उकसाया हुआ Pappu अब अपने खुद के गती से प्रगति कर रहा था। उसके होशियारी पे कभी भी शक नहीं था, नहीं थी तो उसके पास दिशा!! अगर हमारे जैसे बकायदा महा-विद्यालयों में वगेरे पढता तो हमसे बहुत आगे निकल जाता और हम ही उससे सिख रहे होते!!!
उसे मगर हम से technology या programming के अलवा भी बहुत सिखना था, उसे जीने का एक नया सलीका, एक नयी सोच मिल रही थी, उसे अपनी परिस्थिति को बदलने का रास्ता और विश्वास दोनों मिल गए थे!!!...... Pappu उस रस्ते पर अब भागने लगा था!!... उसे अब मेरी या मेरे दोस्त की कोई जरुरत नहीं थी। शायद इस के बाद हमको Pappu नाम के दोस्त की जरुरत थी।
Pappu से अब "Sir" धीरे-धीरे छुट रहा था। में Ashish Sir से सिर्फ Ashish हो रहा था.... मैंने न कभी उसे मुझे Sir बुलाने के वक़्त टोका था न अब "Sir " न बुलाने के लिए। कुछ दिनों बाद में Ashish से "अबे साले!!!..Ashish!!!" बनने वाला था। मगर उसकी सिर्फ ख़ुशी ही थी!!!!!.... Pappu अब आखिर कार Mr. Pappu Sharma बन रहा था!!!... मैंने किसी को इतने जल्दी खुद को उभारते हुए, खुद में परिवर्तीन लाते हुए नहीं देखा था। मैंने उसका ये परिवर्तन अपनी आँखों के सामने होते हुए देखा था!!.... बहुत छोटा, मगर मेरा हाथ था उस में!..इस बात की उतनी ही बड़ी ख़ुशी थी!!!!
अब तक तो हम काफी अच्छे दोस्त बन गए थे। वो हमारे कॉलेज के सिर्फ किस्सों से ही नहीं उन किस्सों में बसे हमारे दोस्तों से भी वाकिफ होने लगा। एक ही उपनगर के होने के कारन हमारा छुट्टी के दिन मिलना शुरू हुआ और देखते ही देखते पप्पू हमारे समूह का हिस्सा बन गया। मैंने तो सिर्फ उसे मिलाया था, मगर जिस तरह से वो घुलमिल गया, ऐसा लगता था की पहेले से हम सब को जानता हो।
उसके घर के मटन और चिकन की बातें होती, कभी वो खुद बनाके लाता, कभी सोचा था की ये बुलाएगा, "चल!! मेरे घर खाने!!!", मगर नहीं उसने कभी नहीं बुलाया... और यार-दोस्तों के घर हम जबरदस्ती के मेहमान बनते मगर मैंने उसे कभी भी इस बात के लिए जोर नहीं दिया!!!!...... कुछ चीज़ें जाहिर नहीं करना चाहता था, और मैंने कभी पूछी भी नहीं!!!...न कभी जानने की कोशिश की!!!! हमारे अलावा भी एक दुनिया थी उसकी, दोनों दुनिया में सिर्फ वो आ-जा सकता था, हमको उसकी इजाज़त नहीं थी। दुनिया भर के लोगों के प्रश्न पर ये घंटो उनसे बातें करता, लड़कियां भी थी उन में, मगर पूछो तो कुछ बताता नहीं था!!!..... मुझे तो ऐसे लगता था की दूसरों के प्रश्नों को, बातों को, सुनके, उन पर सलाह-मशवार्हा करके कभी-कभी उसे अपने प्रश्नों के उत्तर मिल जाते!!!... वो उन लोगों का हौसला बढ़ाते-बढ़ाते अपनी परिस्थितयों से लड़ने का हौसला पाता था!!!...
जो भी हो आज वो मेरे दोस्तों के गट का अभिवाज्य घटक था, वो रहेगा तो ठीक है मगर नहीं रहेग तो कमी खलती है, हम सब एक दुसरे का मजाक उड़ाते है मगर आज भी उसे गाली देने में जो "ख़ुशी या आनंद" मिलता है उसकी कोई तुलना नहीं!!...शायद ये बात उसे भी पता है!!...उसका मजाक, फिर चाहे उसकी इंग्लिश सुधरने की हो, किसी लड़की से नाम से चिढाना हो, अब तो उसे नया फ़िल्मी नाम भी मिला है दबंद के हमारे अपने "पांडेजी!!!...",इन सबकी सिर्फ हसी नहीं आती, इस सबका एक अलग मजा एक अलग से ख़ुशी, वो ख़ुशी इस लिए क्यों की उस पर बहुत भरोसा है की वो न कभी बुरा मान लेगा, ना कभी पलट कर दिल दुखायेगा।
आज उसके पास एक अच्छी नौकरी है, एक अपना खुद का घर है, जो शायद उसका सब से बड़ा सपना था। विदेश में रहता है.... मगर आज भी जब भी उसे पुकारता हु तो,"अबे साले Pappu!!" इसी तरह पुकारता हूँ!!!.... और उसके के बाद उसे ," sorry यार!!" कहता हूँ!! आज करीब ८ साल हो गए हमारी दोस्ती को, कभी नहीं सोचा था उससे पहली बार हाथ मिलाते वक़्त की, ये पहचान ये रंग लाएगी!!!!!
कुछ नए दोस्तों को हमारे पुराने किस्से सुना रहा था, सुनते हुए कहाँ, "ऐसा है मेरा दोस्त Pappu!!!......."
वे मुझे देख रहे थे या नहीं, पता नहीं, वो अस्चर्य, वो हसी उन में भी थी या नहीं, पता नहीं, क्यों की, तुरंत आगे में खुदे से ही कहता चला गया,
"real name ही Pappu है!!!!..... कमाल का बंदा है और मेरा सब से अच्छा दोस्त!!".
सारे लोग परेशान थे, लोगों में असंतोष बढ़ रहा था। हम सारे किसी मसीहा की प्रतीक्षा कर रहे थे!!... हमें बचाने वाला, हमारे कष्ट दूर करने वाला कब आएगा, इसी इंतज़ार में अपने दिन या में कहूं राते बिता रहे थे!!! ऐसे मे हमारे office के वरिष्ठोने हमे ये खुशखबरी दी की हमे इस मुश्किल मे से निकालने के लिए वो मसीहा आ गया है!!!............... हमारे ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा।
फिर अगले दिन हमने office में उस मसीहा को देखा, सब लोगों में खुसर-फुसर शुरू हो गयी.....
कहीं ये वो तो नहीं.... कहीं ये वो तो नहीं!!!!!!
हमारी HR उसे हमे मिलाने के लिए लायी और एक लम्बे-चौड़े लड़का, दिखने में एकदम हीरो के जैसा, लम्बे बाल, मुस्कुराता हुआ,कम-से-कम ६ फीट लंबा, जिसके बड़े-बड़े पंजो से हाथ मिलाकर ही कसरत करने वाले हाथ है, ये साफ़ समझ आता!!!!...... मैंने हाथ मिलाया और कहा,
"Hi, Ashish",
जवाब आया,
"Hi, Pappu Sharma"....
मेरे चेहरे पर उसने आश्चर्य और हसी दोनों पढ़ ली थी शायद क्यों की उसने बिना रुके हस्ते हुए कहाँ,
"real name ही Pappu है Sir!!".....
में पूरी तरह से शर्मिंदा हुआ था, अपनी अश्चार्यता और हसी को शायद में इतने अच्छी तरह छुपा नहीं पाया!!!!.... मुझे लगा, उसे आदत थी मेरे जैसे लोगों की, अपने नाम से वो नहीं, उसके जवाब से शायद मेरे जैसे लोग शरमाते थे!!!...वो हस्ता हुआ चेहरा मगर याद रह गया!!!
मुझे उस वक़्त लगा की ये सच-मुच पागल है जो उसने ये नौकरी को हां बोला, उस वक़्त हम तो रात की उस project की चौकीदारी से बचने की ख़ुशी मना रहे थे!!.....जी हां!!!!!! चौकीदारी ही थी वो, क्यों की एक फटा हुआ project बराबर चल रहा है या नहीं येही देखना था रात भर और अगर कुछ गड़बड़ लगे तो अपना दिमाग न लगाते हुए वरिष्ठो को phone करने का और उसके बाद client को। US का प्रोजेक्ट होने के वजह से रात भर बैठना पड़ता था जिसके लिए हम परेशां हो चुके थे!!!… ऐसा काम, जिस में सिखने जैसा छोड़ो मगर कोई काम भी नहीं है ऐसा काम क्यों लेगा कोई!!!......बहुत जल्दी अपनी धारणा बना लेना उस वक़्त आदत थी हमारी!..... जो जल्द ही बदलने वाली थी।
थोड़ी ही दिनों में हमारा काम दिन के दायरों को छोड़, रात में बहने लगा और हम दिन-रात office में रहने लगे। जिसका मतलब ये था की हम जिस "मसीहा" को अब भूल चुके थे, उससे अक्सर रूबरू होने लगे। मेरे और मेरे दोस्त की जैसे जैसे उससे बातचीत बढ़ने लगी, वैसे वैसे हमे वो और भी दिलचस्प लगने लगा। बहुत दिनों तक वो हमारे रात का मनोरंजन था या जिसे हम अब शुद्ध "हिंदी" में "Time-Pass" कहते है। उसके साथ मजाक-मजाक में होने वाली बातचीत अब वक़्त के साथ अच्छी पहचान में बदल रही थी। एक ही उपनगर(suburb ) के होने कारन समानताये तो थी ही और बात करने के लिए विषय भी बहुत थे। बात करते करते उसकी हिंदी भाषा की समझ और मुहावरे याद रहने लगे। में नागपुर मे कुछ वर्ष बिताने के कारन, हिंदी काफी सुधर गयी थी मगर मुंबई में वैसी ही हिंदी सुनकर अच्छा लग रहा था।
हम उसे धीरे-धीरे समझने लगे थे। वो कहाँ से आया था, कैसे यहाँ तक पंहुचा था, कितने सालों तक क्या-क्या और कहाँ-कहाँ काम किया था, ये सब बातों-बातों में हमे पता चला। उसका काम का और शायद काफी हद तक जिंदगी का तजुर्बा हमसे बहुत ज्यादा था और सब से महत्वपूर्ण बात ये की हमसे बहुत अलग था!!!....उस तजुर्बे ने उसे काफी जल्दी समझदार बनाया था, लोगों का सम्मान करना सिखाया था, सामने वाला अगर कोई चीज़ करता है या कहता है, तो उसमें उसकी भी कोई सोच या मजबूरी होगी समझने की ही नहीं स्वीकारने की भी ताकत थी उस में। सीधा-सीधा कहु तो वो सामने वाले को "मौका" देता था और खुद को उसे समझने के लिए वक़्त। उससे बातें करके में भी और शायद मेरा दोस्त भी काम के अलावा बहुत कुछ सिख रहे थे!!!......
दूसरी चीज़ जो उसको उस जैसे अनेकों से अलग करती थी और मुझे सब से ज्यादा भा गयी थी क्यों की मुझ में नहीं थी, वो थी "लगन" और जो भी, जैसा भी काम है उसे हस्ते हुए, लुफ्त उठाते हुए पूरा करना। वो रात भर अकेला बैठा रहता, कुछ पढता, खेलता, internet पे रहता मगर सोता नहीं था!!... हम सब कभी न कभी उस चौकीदारी में सोये थे, मगर वो जागता था। वो उस में भी खुश था। हम फिर उसे हमारे काम के बारे में बताने लगे, हमें शायद उस में एक अच्छा विकल्प दिख रहा था। अगर ये काम इतना मजा लेके करता है तो वाकई में अच्छा काम को किस तरह से अंजाम देगा ये हम सोच रहे थे। इसी बात को हमने हमारे वरिष्ठो को बताया, मगर अगर उसे वहां से हटाया तो रात की वो चौकीदारी कौन करेगा?? इस सवाल पर सब कुछ ठहर गया।
मेरे दोस्त ने युही उससे एक दिन।।।माफ़ कीजिये रात को, बातों-बातों में पुछा,
"आगे क्या करना है"......... झट से बोला
"Sir, आप के जैसा Programming आना चाहिए!.",
मेरे दोस्त ने फटकारा,
"क्या येही करते हुए आएगा, या अचानक सुबह उठके तू Progammer बनेगा!!.. " सीधी बात करना हम को कभी आया ही नहीं उससे!!!
"sir, आप बताओ, कुछ काम है तो दो ना, में करूँगा, सुबह रुकता हूँ!!...आपको दिखा कर जाऊंगा!!!".
उसे फिर हम छोटे-छोटे अंकगणित के क्रमादेश (algorithm ) लिखने के लिए देने लगे। हमने भी तो ऐसे ही शुरवात की थी, वो लिखता था, पूछता था, गाली खाता मगर फिर पूछके करता। थोड़े ही दिनों में उसे "logic" क्या होता है उससे क्रमादेश कैसे बनाना, फिर अपने ही क्रमादेश की जाच(testing) कैसे करना ये सब आने लगा।
उसे फिर मेरा दोस्त उसके project में से छोटा-छोटा काम देने लगा। वो बिना जाने वो भी करने लगा और तब हमें लगा की इसे अब कोई संगणकीय-भाषा (programming language) सीखनी चाहिए। उसे Java नहीं करना था इस लिए मेरे दोस्त ने उससे पढने के लिए Dotnet के ebooks, और online sites इत्यादि की जानकारी दी। उसके बाद तो उसकी Technical Ragging होती थी ये कहना ही उचित होगा!!!
धीरे-धीरे उसे समझने लगा, हमने जो हमारे Masters में सिखा था उसे सिखाने लगे। हमें भी नहीं आता था, मगर जितना आता था उसे बताते थे, थोड़ी ही दिनों में मुझे लगने लगा की गाली दे-दे के सिखाया हुआ, सिखने के लिए उकसाया हुआ Pappu अब अपने खुद के गती से प्रगति कर रहा था। उसके होशियारी पे कभी भी शक नहीं था, नहीं थी तो उसके पास दिशा!! अगर हमारे जैसे बकायदा महा-विद्यालयों में वगेरे पढता तो हमसे बहुत आगे निकल जाता और हम ही उससे सिख रहे होते!!!
उसे मगर हम से technology या programming के अलवा भी बहुत सिखना था, उसे जीने का एक नया सलीका, एक नयी सोच मिल रही थी, उसे अपनी परिस्थिति को बदलने का रास्ता और विश्वास दोनों मिल गए थे!!!...... Pappu उस रस्ते पर अब भागने लगा था!!... उसे अब मेरी या मेरे दोस्त की कोई जरुरत नहीं थी। शायद इस के बाद हमको Pappu नाम के दोस्त की जरुरत थी।
Pappu से अब "Sir" धीरे-धीरे छुट रहा था। में Ashish Sir से सिर्फ Ashish हो रहा था.... मैंने न कभी उसे मुझे Sir बुलाने के वक़्त टोका था न अब "Sir " न बुलाने के लिए। कुछ दिनों बाद में Ashish से "अबे साले!!!..Ashish!!!" बनने वाला था। मगर उसकी सिर्फ ख़ुशी ही थी!!!!!.... Pappu अब आखिर कार Mr. Pappu Sharma बन रहा था!!!... मैंने किसी को इतने जल्दी खुद को उभारते हुए, खुद में परिवर्तीन लाते हुए नहीं देखा था। मैंने उसका ये परिवर्तन अपनी आँखों के सामने होते हुए देखा था!!.... बहुत छोटा, मगर मेरा हाथ था उस में!..इस बात की उतनी ही बड़ी ख़ुशी थी!!!!
अब तक तो हम काफी अच्छे दोस्त बन गए थे। वो हमारे कॉलेज के सिर्फ किस्सों से ही नहीं उन किस्सों में बसे हमारे दोस्तों से भी वाकिफ होने लगा। एक ही उपनगर के होने के कारन हमारा छुट्टी के दिन मिलना शुरू हुआ और देखते ही देखते पप्पू हमारे समूह का हिस्सा बन गया। मैंने तो सिर्फ उसे मिलाया था, मगर जिस तरह से वो घुलमिल गया, ऐसा लगता था की पहेले से हम सब को जानता हो।
उसके घर के मटन और चिकन की बातें होती, कभी वो खुद बनाके लाता, कभी सोचा था की ये बुलाएगा, "चल!! मेरे घर खाने!!!", मगर नहीं उसने कभी नहीं बुलाया... और यार-दोस्तों के घर हम जबरदस्ती के मेहमान बनते मगर मैंने उसे कभी भी इस बात के लिए जोर नहीं दिया!!!!...... कुछ चीज़ें जाहिर नहीं करना चाहता था, और मैंने कभी पूछी भी नहीं!!!...न कभी जानने की कोशिश की!!!! हमारे अलावा भी एक दुनिया थी उसकी, दोनों दुनिया में सिर्फ वो आ-जा सकता था, हमको उसकी इजाज़त नहीं थी। दुनिया भर के लोगों के प्रश्न पर ये घंटो उनसे बातें करता, लड़कियां भी थी उन में, मगर पूछो तो कुछ बताता नहीं था!!!..... मुझे तो ऐसे लगता था की दूसरों के प्रश्नों को, बातों को, सुनके, उन पर सलाह-मशवार्हा करके कभी-कभी उसे अपने प्रश्नों के उत्तर मिल जाते!!!... वो उन लोगों का हौसला बढ़ाते-बढ़ाते अपनी परिस्थितयों से लड़ने का हौसला पाता था!!!...
जो भी हो आज वो मेरे दोस्तों के गट का अभिवाज्य घटक था, वो रहेगा तो ठीक है मगर नहीं रहेग तो कमी खलती है, हम सब एक दुसरे का मजाक उड़ाते है मगर आज भी उसे गाली देने में जो "ख़ुशी या आनंद" मिलता है उसकी कोई तुलना नहीं!!...शायद ये बात उसे भी पता है!!...उसका मजाक, फिर चाहे उसकी इंग्लिश सुधरने की हो, किसी लड़की से नाम से चिढाना हो, अब तो उसे नया फ़िल्मी नाम भी मिला है दबंद के हमारे अपने "पांडेजी!!!...",इन सबकी सिर्फ हसी नहीं आती, इस सबका एक अलग मजा एक अलग से ख़ुशी, वो ख़ुशी इस लिए क्यों की उस पर बहुत भरोसा है की वो न कभी बुरा मान लेगा, ना कभी पलट कर दिल दुखायेगा।
आज उसके पास एक अच्छी नौकरी है, एक अपना खुद का घर है, जो शायद उसका सब से बड़ा सपना था। विदेश में रहता है.... मगर आज भी जब भी उसे पुकारता हु तो,"अबे साले Pappu!!" इसी तरह पुकारता हूँ!!!.... और उसके के बाद उसे ," sorry यार!!" कहता हूँ!! आज करीब ८ साल हो गए हमारी दोस्ती को, कभी नहीं सोचा था उससे पहली बार हाथ मिलाते वक़्त की, ये पहचान ये रंग लाएगी!!!!!
कुछ नए दोस्तों को हमारे पुराने किस्से सुना रहा था, सुनते हुए कहाँ, "ऐसा है मेरा दोस्त Pappu!!!......."
वे मुझे देख रहे थे या नहीं, पता नहीं, वो अस्चर्य, वो हसी उन में भी थी या नहीं, पता नहीं, क्यों की, तुरंत आगे में खुदे से ही कहता चला गया,
"real name ही Pappu है!!!!..... कमाल का बंदा है और मेरा सब से अच्छा दोस्त!!".
1 comment:
yaar ashish tune saale pappu ko famous kar diya re..
par wo incident nahi bataya.. jab raat ko wo behek gaya tha :)) and humaari HR ne use bulaya tha.. :)
yaad hai na...
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