Friday, December 28, 2012

शाम

एक सुनी ठंडी शाम को
निकला उन पुरानी  पगडंडियों पर
कुछ हसीन पलों को दोबारा जीने
और कुछ जिन्दा पलों को दफनाने!!!

एक खुले मैदान से गुजरते हुए देखा
जिंदगी बेफिक्र होकर खेल रही थी
किसी चीज़ की परवा किये बिना
जीने का लुफ्त उठा रही थी!!!

लौट रहे थे सभी यहाँ
में न जाने कहाँ चला जा रहा था
मंजिल का कोई ठिकाना नहीं
सफ़र में ही मंजिल तलाश रहा था!!!!

सूरज क्षितिज के छोर से झांक रहा था
दिन की कुछ आखरी किरनो को फैला रहा था
भटके हुए पंछियों को शायद
उनके घर का रास्ता दिखा रहा था!!!

कुछ हासील कर, कुछ खो कर लौट रहे थे
कुछ हार तो कुछ जीत कर!!!!
चेहेक कर अपनी कहानी सुना रहे थे
घोसले को ही अपनी मंजिल बता रहे थे

सोचा मेरा भी एक ऐसा घोसला हो
मेरा शोर भी जिनके लिए संगीत हो
हार-जीत के मायनो से परे
जहाँ सिर्फ मेरे लौटने का जश्न हो!!!

सूरज अपनी रौशनी, चाँद सितारों को दे गया
अँधेरे में भी अपनी एक किरन छोड़ गया
मेरे अंधेरों के ऐसे ही उजाले का मगर
मै तो सूरज धुंडने निकला था!!!!
मै तो सूरज धुंडने निकला था!!!!

1 comment:

Prachi Karkhanis said...

it symbolizes life and its simplicity and how simple things can inspire us to be happy...superbly penned down...keep it up mate!!!

Luv
Prachi